28जुलाई1914 से 11नवंबर1918तक अंग्रेजी और तुर्की में चली पहली जंग ए अज़ीम में शामिल होने से क्यों परेशान थे हिंदोस्तान के मुसलमान?

एडमिन

पहली जंग ए अज़ीम ,28 Jul 1914 से 11 Nov 1918 में तुर्की के जंग में शामिल होने से हिंदोस्तान के मुसलमान परेशान हो उठे कि अगर अंग्रेज़ कामयाब हो गए तो तुर्की के साथ बुरी तरह पेश आया करेंगे।
इंग्लैंड के वज़ीर ए आज़म लायड जॉर्ज से वायदा लिया गया कि मुसलमानों के मुकद्दस मकामात को जंग के दौरान कोई नुक्सान नहीं पहुंचाया जायेगा। उस वक़्त तो अंग्रेज़ी हुकूमत ने यह वायदा कर दिया ,
मगर जर्मनी से जंग जीतने के बाद वायदा खिलाफी की गई और अंग्रेज़ फौजें जद्दाह और बसरह में दाखिल कर दी गईं।
अंग्रेज़ों को अपना किया वायदा याद दिलाने के लिए ही तहरीक ए खिलाफत की बुनियाद डाली गई।
जिसके अहम मक़ासिद थे खिलाफत ए उस्मानिया बरकरार रखी जाए, मुकद्दस मुक़ामात ( मक्का, मदीना मस्जिद ए नबवी) खिलाफत ए उस्मानिया के हवाले किये जाएं, सल्तनत ए उस्मानिया को तकसीम ना किया जाए।
बतारिख 23 नवम्बर 1919 को खिलाफत मूवमेंट ( तहरीक ए खिलाफत) का पहला जलसा दिल्ली में हुआ जिसमें अंग्रेज़ हुकूमत को अपना वायदा याद दिलाने की गर्ज़ से उनके जश्न में शामिल नहीं होना तय हुआ।
साथ ही यह भी तय हुआ कि अगर वो अपने वायदे पर अमल नहीं करते तो उन का बॉयकॉट किया जाएगा।
1920 में मौलाना मुहम्मद अली जौहर की कयादत में एक वफ्द इंग्लैंड, इटली और फ्रांस के दौरे पर गया ताकि इंग्लैंड वज़ीर ए आज़म को उसका किया वायदा याद दिलाया जाए।
इस टीम ने इंग्लैंड पहुंच कर लायड जॉर्ज को उसका वायदा याद दिलाया मगर उसने कहा” कि जब ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी से खौफनाक इंसाफ हो चुका तो तुर्की उससे कैसे बच सकता है।
खिलाफत तहरीक के तहत उस्मानी मुजाहिदीन के इलाज और उनकी खैर ओ आफियत के लिए हिंदोस्तान से नर्स, डॉक्टर, दवाएं और रकम इकट्ठी कर के भेजी गई।
पुरे हिंदोस्तान में जगह जगह जुलूस और जलसे हुए, हड़तालें हुईं, तहरीक के अहम लीडर जेलों में डाल दिये गए मगर तहरीक में कोई फर्क ना आया।
इसमें सबसे अहम किरदार मौलाना मुहम्मद अली जौहर की वालिदा का था जिनका नारा कहती हैं मां मुहम्मद अली की, जान बेटा अपनी खिलाफत पर दे दो”, बहुत मशहूर हुआ।
इस दौरान मौलाना ज़फ़र अली खां ने जमींदार, मौलाना आज़ाद ने अल_हिलाल और मौलाना जौहर ने कामरेड व हमदर्द अखबारों के ज़रिये मुल्क में तूफान खड़ा कर दिया।
कमेटी ने 1920 के आखिर में बॉयकॉट का फैसला किया और तहरीक का रहनुमा गांधी को बनाया गया।
मुल्क में बर्तानवी हुकूमत के टाइटल, मेडल, हुकूमत की काउंसिल से इस्तीफे, सरकारी मुलाजमत से दस्त बरदारी, तालीम गाहों के लिये सरकारी मदद ना लेना, जैसे कड़े फैसले लिये जाने लगे।
मौलाना जौहर ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की इंतिज़ामिया से भी बॉयकॉट करने का मुतालबा किया।
लेकिन इनकार कर देने पर मौलाना ने कुछ तलबा ए अलीगढ़ को साथ ले जामिया मिल्लिया की बुनियाद डाल दी और 1925 में यह इदारा दिल्ली मुन्तक़िल कर दिया गया।
इधर जैसे ही खिलाफत तहरीक के मुसलमान लीडर्स का जेल जाना शुरू हुआ गांधी ने हरकत इख्तियार की और उस वक़्त खिलाफत तहरीक ख़त्म करने का ऐलान कर दिया जब तहरीक के सभी मुस्लिम लीडर जेल में थे और इस तरह ख़िलाफत तहरीक भी ख़त्म हो गई और अवाम का मुस्लिम कायदीन से यकीन भी उठ गया,
यहां से गांधी सेक्यूलरों के महात्मा बन गए और मौलाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली जौहर जैसे कौम परस्त गुमनाम हो गए।
जिन्होंने फलस्तीन और तुर्की मुसलमानों का दर्द भी अपने सीनों में महसूस किया था और उसके लिये इतनी बड़ी मुहिम खड़ी की थी।
साभार:
मजलूम खान।

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