सरकार ने नागरिकता कानून के मसले पर संसद में क्योंकर फिर से झूठ बोला है ?

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रिपोर्टर:-

सरकार इस मसले पर जितनी सफाई दे रही है, उतना ही मामले को उलझाती जा रही है !
गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा है कि किसी को ‘संदिग्ध नागरिक’ के तौर पर चिन्हित नहीं किया जाएगा।
इससे यह साफ होता है कि लोगों को ‘संदिग्ध’ के तौर पर चिन्हित करने को लेकर जो सवाल उठ रहा है, वह सही है.

सिटिज़नशिप (रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटिज़न्स एंड इश्यू ऑफ नेशनल आइडेंटिटी कार्ड्स) रूल्स, 2003 पहले एनपीआर और फिर एनआरसी का प्रावधान करता है।
यह कानून कहता है कि एनपीआर के तहत जो रजिस्टर बनेगा, उसमें ‘अवैध प्रवासियों’ और ‘संदिग्ध नागरिकों’ की पहचान की जाएगी, लेकिन ‘संदिग्ध नागरिक’ कौन है, इसकी परिभाषा क्यों नहीं दी गई है।
अगर कानून कहता है कि ‘संदिग्ध नागरिक’ छांटे जाएंगे तो अमित शाह के आज के बयान को क्या माना जाए?
जब तक यह कानून बदलता नहीं है तब तक तो वही सही है जो कानून में लिखा है।

संदिग्ध नागरिक’ की परिभाषा के बगैर ‘संदिग्ध नागरिक’ कैसे छांटे जाएंगे?
कौन संदिग्ध होगा, इसे 2003 रूल्स के नियम 4 के मुताबिक, लोकल रजिस्ट्रार तय करेगा,
लेकिन कानून में यह नहीं बताया गया है कि इसका आधार क्या होगा? फिर रजिस्ट्रार किन मानकों पर किसी को संदिग्ध मानेगा?
क्या लोकल रजिस्ट्रार अमित शाह का भाषण सुनकर अपना निर्णय देगा या कानून में जो लिखा है, उसके आधार पर निर्णय देगा?
वे कह रहे हैं कि NPR में कोई भी कागजात नहीं मांगा जाएगा. अब कोई यह बताए कि माता पिता का जन्मस्थान और जन्मतिथि बिना कागजात के कैसे सही मानी जाएगी?
क्या कोई व्यक्ति ये सूचनाएं जबानी जो भी बता देगा और वह मान ली जाएगी? फिर इस सूचना का मतलब क्या रह गया?

कुछ ​ही दिन पहले गृहमंत्री ने खुद कहा है कि ये दोनों सूचनाएं जरूरी होंगी. ये सूचनाएं सरकार किस रूप में इकट्ठा करेगी?
वे कह रहे हैं कि सीएए नागरिकता छीनने का कानून नहीं है. यह बात उनको बताई किसने कि सीएए नागरिकता छीनने का कानून है?
इस कानून के आलोचकों तो यह तो कभी नहीं कहा कि सीएए से नागरिकता चली जाएगी? अमित शाह ऐसा क्यों कह रहे हैं?

आलोचक तो यह कह रहे हैं कि सीएए में विसंगतियां हैं जो एनआरसी के आते ही परे​शानियां खड़ी करेंगी.
लोगों का डर वहां से निकला है जब वे क्रोनोलॉजी समझा रहे थे कि पहले कैब आएगा, फिर एनआरसी आएगा. ।
लोग कैब से नहीं, एनआरसी से डरे हुए हैं, जिसके जरिये असम में बर्बादी की पटकथा लिखी गई.
कोई मामला कोर्ट में जाता है तो कानून में जो लिखा है, कोर्ट उसके आधार पर फैसला देता है. क्या आगे से कोर्ट अमित शाह से पूछकर निर्णय देगा?
क्या कोर्ट अमित शाह और नरेंद्र मोदी के भाषण सुनकर निर्णय देगा?
सबसे अंतिम बात, धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रावधान भारत के संविधान के विरुद्ध है.।
यह संविधान और लोकतंत्र की मूल भावना के ही खिलाफ है. सरकार ऐसा प्रावधान क्यों करना चाहती है?
अगर सरकार की मंशा सही है तो वह संवैधानिक भावना के विपरीत जाकर धार्मिक आधार पर नागरिकता का प्रावधान क्यों कर रही है?
सरकार हर दिन नागरिकता कानून के मुद्दे पर विरोधाभासी बयान क्यों दे रही है?

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