यहां सवाल यह उठता है,कि आशूरा के दिन 13 अक्तूबर सन् 680 ईसवी को अपने सिर्फ़ 72 साथियों के साथ भ्रष्टाचारी और अत्याचारी शासक यज़ीद के साम्राज्य से टकराने वाले इमाम हुसैन से गांधी और उनके जैसे लाखों लोगों ने क्या सीखा ?

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रिपोर्टर:-

जिसकी वजह से न केवल उन्होंने अत्याचार के ख़िलाफ़ सफल लड़ाई लड़ी, बल्कि ख़ुद भी अमर हो गए।
अपने आंदोलन से तारीख़ के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक की बुनियादों को हिला देने वाले गांधी ने कहा था,
मैंने इमाम हुसैन से सीखा कि मज़लूम या पीड़ित रहते हुए भी जीत कैसे हासिल की जा सकती है।

वास्तव में कर्बला की लड़ाई से पहले युद्ध में मारे जाने वालों और मज़लूमों (पीड़ितों) को हमेशा पराजित और अपमानित समझा जाता था,लेकिन इमाम हुसैन ने कर्बला में दुनिया को पहली बार यह सिखाया कि पीड़ित रहकर और अपनी जान देकर भी कैसे लड़ाई जीती जा सकती है!

महात्मा गांधी का कहना था कि भारत वासियों के लिए मैंने नया कुछ नहीं किया है।
मैंने कर्बला के आंदोलन से जो सीखा, वहीं भारत के लोगों तक पहुंचा दिया।
अगर हमें भारत को बचाना है, तो हमें अली के बेटे हुसैन के मार्ग पर चलना होगा।
पीड़ित रहते हुए लड़ाई कैसे जीती जाती है यह मैंने हुसैन से सीखा।

आज भी दुनिया में जहां कहीं मज़लूम हैं, वह चाहे फ़िलिस्तीन में हों, म्यांमार में, या कश्मीर में हो।
अगर इमाम हुसैन से वही सीखेंगे जो गांधी ने सीखा था,
निश्चित रूप से जीत उन्हीं की होगी, फिर इस लड़ाई में संख्या, बल, हथियार और शक्ति की कोई हैसियत नहीं रह जाएगी।

इमाम हुसैन का यह संदेश पूरी मानवता के लिए है।
किसी धर्म या मज़बह से विशेष नहीं है।
यही वजह है कि लोग धर्म और मज़हब से ऊपर उठकर कर्बला के आंदोलन से सीखते हैं और अपने उद्देश्य के साथ साथ ख़ुद भी अमर हो जाते हैं।

आज दुनिया भर में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाई जा रही है ।
धर्म के नाम पर उन्हें सताया जा रहा है और उनके साथ भेदभाव हो रहा है?
तो फिर उन्हें भी अपने दुश्मन की ताक़त और संख्या से प्रभावित हुए बिना, भूखे और प्यासे रहकर और अपनी जान की परवाह किए बग़ैर इमाम हुसैन (अ) के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए और जीत हासिल करनी चाहिए।

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