रिटायर्ड के बाद भी इस महान जज ने सरकारी बंगलो क्यों खाली नहीं किया?
विशेष
संवाददाता
इक बंगला रहे न्यारा :-
9 नवंबर 2022 को अपनी नियुक्ति के समय बहुत हाई मोरल ग्राउंड और एक निराश देश की उम्मीदों के साथ भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने रिटायरमेंट के साथ नैतिकता, भारतीय न्याय के सिद्धांत और मोरल ग्राउंड को रसातल में पहुंचाते हुए इतने निचले स्तर को पहुंच गये हैं कि अब उच्चतम न्यायालय ही केंद्र सरकार से कह रहा है कि जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ से 5, कृष्ण मेनन मार्ग स्थित आधिकारिक बंगले को खाली कराया जाए जो कि वह खाली नहीं कर रहे हैं।
दरअसल नियम के अनुसार जस्टिस चंद्रचुड़ को अपने रिटायरमेंट के 3 से 6 महीने के अंदर बंगला खाली कर देना चाहिए , नियम यही कहता है, यद्यपि लोग 10-15 दिन में ही नये मुख्य न्यायाधीश के लिए बंग्ला खाली कर देते हैं। मगर दो विकलांग लड़कियों को गोद लेने की खबर वायरल होने के कारण हाई मोरल ग्राउंड लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश बने जस्टिस चंद्रचुड़ अब बंग्ला खाली करने में आनाकानी कर रहे हैं, इसके बावजूद कि दिल्ली में 7 टाईप का बंगला नंबर 14 तुगलक रोड उन्हें आवंटित हो चुका है।
दरअसल कुछ मामलों में सुरक्षा की दृष्टि से रिटायरमेंट के बाद भी सरकार पूर्व मुख्य न्यायाधीश को बंग्ला आवंटित करती है , मगर जस्टिस चंद्रचुड़ वहां जाने का नाम ही नहीं ले रहें हैं।
उनके इस बंगला प्रेम के कारण जस्टिस संजीव खन्ना को वह बंगला नहीं मिला और वह रिटायर तक हो गये और अब जस्टिस गवई भी मुख्य न्यायाधीश के अधिकारिक बंगले का इंतजार कर रहे हैं।
10 नवंबर 2024 को मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए जस्टिस चंद्रचुड़ अब कह रहें हैं कि बंगले में रहने के लिए उन्हें मौखिक अनुमति प्राप्त है।
सरकारी काम-काज में मौखिक अनुमति क्या होती है ? देश के मुख्य न्यायाधीश रहे व्यक्ति को नहीं पता जैसे यह नहीं पता कि भारतीय न्याय व्यवस्था में भगवान का निर्देश नहीं चलता बल्कि सबूत और गवाह चलते हैं जिसे बाबरी मस्जिद के मामले में सच मानकर भी विरोध में फैसला सुनाया।
डीवाई चंद्रचूड़ को मौखिक आदेश का शायद नहीं पता होगा कि उसकी सरकारी कामकाज में कोई अहमियत नहीं , इसलिए वह बंगला ख़ाली करने के लिए भगवान के आदेश की प्रतीक्षा कर रहें होंगे।.
यही वजह है यह घटनाक्रम बताता है कि जो व्यक्ति एक बंगला के लिए इतना नीचे गिर सकता है वह बाबरी मस्जिद का फैसला देने के लिए कितना नीचे गिरा होगा।
संवाद: पिनाकी मोरे