निजीकरण पर ठनी रार न उगलते बन रहा न निगलते दोषी कौन

लखनऊ

वाह रे उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन

निजीकरण पर ठनी रार , निजीकरण ना निगलते बन रहा ना उगलते आखिर दोषी कौन*

लखनऊ – उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन में अवैध रूप से विराजमान महाज्ञानी अनुभवहीन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जो कि देश के प्रशासन की रीढ़ समझे जाते हैं जिनका मुख्य कार्य सरकार की नीतियों को लागू कराना, कलेक्टर व जिलाअधिकारी के रूप में जनता की सेवा करना विकास कार्य करने रोजगार उपलब्ध कराने देश को व प्रदेश को विकसित करने कानून व्यवस्था को लागू करने आदि का होता है।

परन्तु उत्तर प्रदेश में यह अधिकारी अपना मूल कार्य ना कर के जनता के विपरित जा कर आज कल अपने उद्योगपति मित्रों के लिए कार्य कर रहे हैं वो भी ऊर्जा क्षेत्र में जिसका यह निजीकरण करने की तैयारी कर रहे हैं। जो कि मूलतः एक जनता से जुड़ा हुआ विभाग है। इससे गरीब से गरीब और बड़े बड़े उद्योगपति तक प्रभावित होते हैं। जिसमें मूल्य में एक प्रतिशत की बढ़ौतरी भी गरीब तबके से लेकर बड़े बड़े उद्योगपति तक को प्रभावित करती है।

इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था और पूरी सरकार भी प्रभावित होती है लेकिन इस मूलभूत सुविधा को गरीबों की पहुंच से दूर कर के प्रदेश को लालटेन युग में ढकेलने की तैयारी यह महाज्ञानी अनुभवहीन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी कर रहे हैं इनके इस व्यवहार से तो लगता है कि इन्होंने इस लोकप्रिय सरकार को जड़ से उखाड़ने की कसम खा कर इस कार्य को यानी विद्युत वितरण निगम को निजी हाथों में देने हजारों लोगों की नौकरियो को खत्म करने की पूरी तैयारी कर ली है।

इस व्यवहार से तो लगता है कि या तो इन अधिकारियों ने विपक्षी दलों से हाथ मिला लिया है। या फिर इसमें इनका ही कोई विशेष स्वार्थ है। इसी क्रम में अपनी कार्ययोजना को सफल करने के लिए ही मध्यांचल विद्युत वितरण निगम में तैनात भारतीय प्रशासनिक सेवा के अनुभवी अधिकारी भवानी सिंह खंगारौत को हटा कर एक अनुभवहीन भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी( 2017 बैच ) रिया केजरीवाल की नियुक्ति की कर दिया जाता है। जिसके पास कोई भी प्रशासनिक अनुभव नहीं होता है जिसकी वजह से पूरे मध्यांचल में अराजकता का माहौल‌ व्याप्त है। छोटे से लेकर बड़ा कर्मचारी तक इसका शिकार हो रहा है। यहां तक चर्चा है कि दो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे निदेशकों ने भी इसी व्यवहार के कारण इस्तीफा दे दिया ।

विभागीय चर्चा की मानें तो चाटुकारो से घिरे रहना इनको पसन्द है। एक जिले की भी कमान तो जिसने आज तक संभाली नहीं और कहा मध्यांचल विद्युत वितरण निगम जिसके अधीन 19 जिले आते हैं।
प्रदेश के ऊर्जा विभाग में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तानाशाही का एक ताजा तरीन उदाहरण है कि जिन लोगों के ऊपर नियमों को लागू करने की जिम्मेदारी होती है वही नियम विरुद्ध तैनाती कर रहे है। जिन अभियंताओं ने अपनी परिवार से भी ज्यादा समय इस विभाग में दिया उनको यह भारतीय प्रशासनिक अधिकारी अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करते हैं।

जिसकी वजह से विभाग निरंतर घाटे में जा रहा है। माननीय रिया केजरीवाल मात्र स्नातक हैं और यह विभाग उच्च यांत्रिकी है। जहां छोटी छोटी बातों का ध्यान अभियंताओ को रखना पड़ता है। जरा सी चूक में एक बहुमूल्य मानव जीवन खत्म हो जाता है और साथ ही खत्म हो जाता है एक पूरा परिवार एक महिला के मांग का सिन्दूर उजड़ जाता है। बच्चे के सिर से पिता का साया छिन‌ जाता है। बूढ़े मां-बाप की बुढ़ापे की लाठी टूट जाती है।

परन्तु भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता उनको तो बस अपने अहम् और ऐशोआराम से मतलब है।
वहीं अगर अभियंता इस विभाग की कमान संभालेंगे तो उनको पूर्ण अनुभव होता है कि क्या करने से क्या होगा? अभियंता वर्ग ने जमीनी स्तर पर कार्य किया होता है. क्योंकि उनका काम ही बिजली पैदा करना और उसे सुरक्षित रूप से न्यूनतम दर व सुरक्षित रुप में प्रदेश की जनता तक पहुचाना। क्यों कि इसी ज्ञान वा अनुभव की वजह से उनके घर की रोटी चलती है और जब से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने इस विभाग की कमान संभाली तब जो घाटा 77.47 करोड़ मात्र था वो अब 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपए हो गया है।

जब कि कर्मचारीयों और अधिकारियों की संख्या घटी है और ठेके पर रख कर कार्य करने वालों की संख्या बढ़ी है। साथ में उपभोक्ताओं की भी संख्या बढ़ी है। लेकिन मुनाफे की जगह घाटा यह अनुभवहीनता नहीं तो क्या है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय तक में उत्तर प्रदेश सरकार एक शपथ पत्र के माध्यम से अपना पक्ष में रखती है कि इन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की नियुक्ति टेंपरेरी है अस्थाई है। कुछ समय बाद मेमोरेंडो आफ आर्टिकल जो कि इस‌ विभाग का संविधान हैं उसके अनुसार से नियुक्तियां की जाएंगी। लेकिन इस बात को भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय को कहे हुए उस शपथ पत्र को दाखिल किए हुए 21 वर्ष हो चुके हैं।

परंतु आज तक कोई योग्य अभियंता इनको मिल ही नहीं और घाटा बढ़ता चला जा रहा है। संविदा कर्मियों की मौते बढ़ती चली जा रही हैं।कर्मचारियों अधिकारियों अभियंताओं में आक्रोश है। आए दिन धरना प्रदर्शन हो रहा है। वार्ता की जगह तानाशाही ने ले ली है ।अभियन्ता कुछ विरोध करता है तो नए-नए नियम बनाकर उनको प्रताड़ित किया जाता है। 9 जुलाई को ही निजीकरण के विरोध में एक धरना प्रदर्शन हो रहा था यह धरना प्रदर्शन सड़क पर हो रहा था भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने शक्ति भवन का परिसर/ गेट बंद कर दिये ताकि कोई भी कर्मचारी या अभियंता अंदर ना आ सके ऐसी स्थिति को देखते हुए राहत इंदौरी साहब का एक शेर याद आता है कि
कल तक दर-दर फिरने वाले घर के अंदर बैठे हैं और बेचारे घर के मालिक दरवाजे पर बैठे हैं।

खुल जा सिम सिम याद है किसको कौन कहे और कौन सुने। गूगे बाहर चीख रहे हैं बहरे अंदर बैठे हैं। यानी जो विभागीय कर्मचारी है वह अपने ही कार्यालय से बाहर बैठा हुआ धरना प्रदर्शन कर रहा है और जो बाहरी व्यक्ति यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं जो अस्थाई रूप से नियुक्त किए गए हैं। वह कार्यालय के अंदर बैठकर इन स्थाई कर्मचारियों को भविष्य का फैसला करते हैं। अगर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को यहां बैठना है तो उनको इंजीनियर होना चाहिए जिनके पास पर्याप्त कार्य अनुभव हो जैसे की रेलवे में होता है जैसे केन्द्रीय सड़क निर्माण विभाग में होता है ।

इसी तरह के अन्य इंजीनियरिंग विभाग है यह प्रशासनिक अधिकारी वहां क्यों नहीं नियुक्त किए जाते वैसे इस‌ विभाग में कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी है जो की अंदर ही अंदर निजीकरण का विरोध तो करते हैं पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित होने से भी डरते हैं अगर इस निगम का प्रबंधन मेमोरेंडम आर आफ आर्टिकल के अनुसार अभियंता वर्ग के हाथ में आ जाए तो उत्पादन से लेकर वितरण तक धीरे-धीरे सारी समस्याओं का समाधान भी हो जाएगा और यह विभाग प्रदेश को अपने बलबूते पर रोशन करने की क्षमता का प्रदर्शन भी करने लगेगा आज जो हम निजी घरानों से बिजली खरीद कर आपूर्ति करते हैं उसकी जगह स्वयं के उत्पादन ग्रह की संख्या बढ़ जाएगी और हमको इस विभाग का निजीकरण कभी नहीं करना पड़ेगा लेकिन कौन कहे और कौन सुने गूंगे बाहर चीख रहे हैं बहरे अंदर बैठे हैं। खैर
युद्ध अभी शेष है।

साभार;
अविजित आनन्द संपादक और चन्द्र शेखर सिंह प्रबंध संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ

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