एक बागी जात सरदार मोहम्मद उस्मान जिसने बनाई इराक में हुकूमत,प्राचीन काल में बलूचिस्तान पर भारतीय राजाओं से ज्यादा फारस (ईरान) के हुक्मरानों ने शासन किया है।

संवाददाता

खुर्शीद अहमद

मोहम्मद उस्मान – एक बाग़ी जाट सरदार जिस ने इराक़ में हुकूमत बनाई

प्राचीन काल में बलूचिस्तान पर भारतीय राजाओं से अधिक फारस ( ईरान ) के शासकों ने शासन किया है।

फारस में बहराम गौर नाम का एक सम्राट गुज़रा है उस ने बलूचिस्तान व सिंध से हजारों जाट जाति के लोगों को ले जा कर इराक़ में बसाया था यह लोग दक्षिण इराक़ में आबाद किए गए यह खेती करते और भैंस पालते थे इन लोगों को देख कर कुछ और जाटों ने इराक़ का सफर किया वह उबल्ला शहर में छोटा-मोटा कारोबार और चौकीदारी का काम करने लगे।

हज़रत उमर के ज़माने में इस इलाके पर अबू मूसा अशअरी के नेतृत्व में इस्लामी लश्कर ने विजय प्राप्त की , हज़रत अबू मूसा अशअरी के समझाने पर इन जाटों ने इस्लाम कबूल कर लिया यह मुसलमान हो गए लेकिन गाय का मांस नहीं खाते थे ।

हज़रत अली के जमाने में जब हज़रत अली और हज़रत मुआविया के बीच जंगें सिफ़्फ़ीन हुई तो हज़रत अबू मूसा अशअरी इन जाटों की सेना के साथ हज़रत अली की तरफ़ से जंग में शरीक हुए थे।

मोहम्मद बिन कासिम ने जब सिंध फतेह किया तो इन जाटों का अरब देशों मे आना जाना बढ़ गया। दक्षिण इराक़ में इन जाटों की बड़ी आबादी थी जो वासित शहर के आसपास आबाद थे और अरब इन्हें ज़त व ज़ुत़ कहते थे।

आगे चलकर खिलाफते अब्बासिया क़ायम हुई खलीफा जाफर मंसूर ने बगदाद शहर बसाया , बगदाद से इन जाटों का इलाका क़रीब था। यह जाट बग़दाद सफर करते नौकरी करते और लौट आते।

खलीफा हारून रशीद के बाद उन का बेटा अमीन खलीफा बना उस ने अपने भाई मामून रशीद को युवराज पद से हटा कर अपने बेटे को वली अहद ( युवराज ) बना दिया। जिस पर मामून रशीद ने बग़ावत कर दी और एक सेना लेकर बग़दाद पर हमला कर दिया। अपने भाई को कत्ल करके खुद खलीफा बन गया।
इस जंग में मामून के करीबी सैनिक सरदारों में एक जाट ” सरब बिन अल हकम बिन यूसुफ ” भी था।

इतिहासकारों की माने तो मामून रशीद ने अपने संघर्षों के समय में जाटों का साथ लेने के लिए उन से कुछ वादे किए थे। जिसे उस ने पूरा नहीं किया। इस लिए जाट नाराज़ हो गए और सन 810 ईसवी में इन्होंने बग़ावत कर दी। , बसरा शहर पर कब्ज़ा कर लिया और मोहम्मद बिन उस्मान के नेतृत्व में एक हुकुमत क़ायम कर दिया। मोहम्मद बिन उस्मान के साथ दो जाट सरदार और थे जिन का नाम समलक ज़ती और यूसुफ बिन ज़ती था।
धीरे धीरे यह लोग अपनी ताकत बढ़ाते गए और कूफा व वासित जैसे शहरों तक अपने शासन का विस्तार कर लिया ।

हम जानते हैं कि मामून रशीद बहुत शान व शौकत वाला खलीफा था। उस के समय में ख़िलाफत अब्बासी सुपर पावर समझी जाती थी। दुनिया की कोई हुकूमत उस से टकराने की हिम्मत नहीं करती थी। लेकिन इन जाटों ने राजधानी बगदाद से सिर्फ सौ किलोमीटर के फासले पर अपनी सरकार बनाई थी। मामून रशीद इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता था।

मामून रशीद ने एक सेना भेजी जाटों ने सीधे मुकाबला करने के बजाए छापामार युद्ध शुरू किया। यह लोग वासित शहर के पास दलदली इलाकों में छिप जाते और घात लगाकर हमले करते आखिर कार अब्बासी सेना को हराने में सफल हो गए ।
आख़िर में मामून रशीद का छोटा भाई मोअतसिम जब खलीफा बना उस ने दूसरी सेना तैयार की जिस में मिस्र के लोग अधिक थे क्योंकि उन्हें दलदली इलाकों में जंग लड़ने का तजुर्बा था।

इस लश्कर को भी जाटों ने खूब छकाया। नौ महीने तक लड़ाई चली समलक व यूसुफ मारे गए और जाट सरदार मोहम्मद बिन उस्मान छिप गया।
अब्बासी सेना ने बारह हजार जाट पुरूषों के साथ टोटल 27000 जाट पुरूष महिला और बच्चों को गिरफ्तार किया और उन्हें सीरिया के शहर ऐन ज़रिया में आबाद कर दिया ताकि जाट ताक़त दोबारा इकट्ठा न हो पाए।

यह सन 835 की घटना है 25 वर्ष शासन करने के बाद सरदार मोहम्मद बिन उस्मान की ताक़त खत्म हो चुकी थी कुछ दिन छिप छिपकर रहा और फिर बहरीन जा कर करामता में शामिल हो गया।

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