यूपी के अंबेडकर नगर में ये क्या हो रहा है जहां सीएम का पुतला दहन किया गया, किंतु पुलिस इसे रोकने में हुई नाकाम,जाने क्या है पूरा माजरा

अंबेडकर नगर।
संवाददाता

हत्या लूट और बलात्कार के साथ पुलिस की गोलियों से मरने वाले तथाकथित अपराधियों की संख्या से,
जहां उत्तर प्रदेश के आंकड़े निरंतर बढ़त की हर सीमा उछल कर पार कर रहे हैं ।
वहीं सरकार को लेकर प्रदेश स्तर पर
अधिवक्ताओं का आक्रोश जगह जगह सातवें आसमान पर दिखाई दे रहा है।

भाजपा सरकार के हर अच्छे और बुरे कार्य को तालियां बजाकर,
बहस करके जो अधिवक्ता समाज कल तक
सरकार के लिए अपना सब कुछ लुटा देने को तैयार था ,
योगी सरकार का मुरीद था।
किंतु आज़ पुलिस की तरफ सरकार का पलड़ा झुकता है तो ,
अधिकताओं में रोष पैदा होना जाहिर सी बात है जिसको गलत नहीं माना जा सकता।
मगर सरकार की मजबूरी है,

पुलिस के विरोध में इलेक्शन के दिनों में वह कैसे खड़ी हो जाए?

पुलिस के दारोमदार पर ही ,
सरकार के लगभग हर अच्छे और बुरे काम अंजाम पाते हैं।
हापुड़ कांड से पीड़ित अधिवक्ता समाज अंबेडकर नगर सहित प्रदेश के तमाम जनपदों में
मा. मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के पुतले को फूंकने के वास्ते,
उस प्रतीकात्मक लाश को कंधे पर लादे
अपने परिसर में उनके दहन की तैयारी ही नहीं कर रहा है बल्कि
अधिवक्ता समाज के वरिष्ठ जनों के साथ खड़े होकर ‘वह किया, जो नहीं करना चाहिए था!

अंबेडकर नगर में ‘योगी की पुलिस’ पुतला दहन नहीं रोक पाई।
लोकतांत्रिक तरीके से हापुड़ में अधिवक्ताओं के विरोध स्वरूप पुलिस ने ,
अंग्रेजी शासन काल की शैली पर उन पर जो घातक लाठियां बरसाई हैं
उन बेशर्म लाठियों से अधिवक्ता समाज में इतनी नफरत है कि,
जिसका जवाब भाजपा सरकार को इलेक्शन के दिनों में भुगतना पड़ेगा तब महसूस होगा कि ऐसा क्या गुनह किया कि लुट गए?

सूत्रों की माने तो अधिवक्ताओं के दिल में लाख भाजपा के लिए प्यार हो
मगर उन्होंने अगली बार कसम खाई है भाजपा को कतई वोट नहीं देंगे।
अपने भाषण में उन्होंने जो ललकार दिखाई है,
वह उनके दुखते रग की नफ़रत भरी पीड़ा है ।
उनके भाइयों के बहते हुए खून की तड़प है ।
सिर्फ’ बुलडोजर और फर्जी एनकाउंटर’ के दम पर अपने दुश्मनों का सफाया और निजी अहंकार पूरे किए जा सकते हैं!
मगर समाज में पनपने वाले नफ़रत का जवाब, नफ़रत से नहीं दिया जा सकता।

जबकि हाल ही में हुए उप चुनाव में मिली तगड़ी हार जो घोसी के घुसे से’ सरकार को सबक लेने जैसा मामला था ! सरकार को
अपनी आदत में सुधार लाना चाहिए था ।
लेकिन जब दिन प्रतिदिन किसी भी लोकतांत्रिक शासक में अकड़ बढ़ती जाए…
तो समझ लेना चाहिए कि इस शासन का अंत नजदीक है।
वकील समाज के एक विद्वान वक्ता ने अपने विचार व्यक्त करते हुए ऐसा बोलबचन दिया।
तो दूसरी तरफ अयोध्या में संत महात्माओं के एक समूह ने, एक वीडियो में ‘योगी जी’ को अघोरी कहा !और कहा कि वो एक नकली संत हैं ।
वैष्णव संप्रदाय से उनका कुछ लेना देना ही नहीं है।

अयोध्या मंदिर में किसी भी खास कार्यक्रम के दौरान
केवल बड़े लोगों को ही जगह दी जाती है।
गरीबों के लिए वहां कुछ नहीं है ।
इतना ही नहीं एक स्थानीय महात्मा ने यहां तक कहा कि,अयोध्या के संत अब दो भागों में बंट चुके हैं।
एक ‘सरकारी संत’ और दूसरे ‘सामान्य संत’ हैं। इलेक्शन जितना नजदीक आ रहा है,
उतने ही तरह-तरह के नए-नए चक्रव्यूह,
सरकार के लिए मुश्किल रचते नज़र आ रहे हैं।

साभार
डा. मेला

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