आज तक इंतजार ही इंतजार रहा ,देश आजाद होकर 77साल बीत गए फिर भी नही निकली आजादी की सुबह ?

हमारा राष्ट्रवाद

बिहार अफसोस, आज बदलते भारत में राष्ट्रवाद की बुनियाद आज़ादी का संघर्ष या साम्राज्यवाद से हमारी लड़ाई नहीं है। आज़ादी के दीवाने हमारे आदर्श नहीं हैं। आज हमारा राष्ट्रवाद मज़हबी नफरत की बुनियाद पर टिका है। हमारे राष्ट्रवाद का मतलब राष्ट्र निर्माण या साम्राज्यवाद के ख़िलाफ संघर्ष नहीं है।
हमारा राष्ट्रवाद बस इतना सा है कि किस तरह इसकी कसौटी पर अल्पसंख्यकों की परीक्षा ली जाए, आज बलात्कारियों के समर्थन में तिरंगा यात्रा निकलती हैं, इससे बड़ा तिरंगे का अपमान क्या होगा ?

हुकूमती ऐलान है सेल्फी विथ तिरंगा और हर घर तिरंगा, सायद आज राष्ट्रवाद की यह भी एक परिभाषा है, मैं किराये पर रहता हूँ लेकिन अल्लाह का शुक्र है कि कम से कम एक छत तो है किराये की ही सही, उसी किराये की छत पर तिरंगा लगा दिया है, लेकिन सोचता हूँ उन बेचारों के बारे में जिन्हे अभी चार दिन पहले घर तोड़कर रोड पर डाल दिया गया वह इस हुकूमती फरमान पर अमल करके किस तरह अपने राष्ट्रवाद का दिखावा करेगें?

अपने घर अपने गाँव अपने शहर अपने देश से मुहब्बत इंसानी फितरत का हिस्सा होता है, इसमें किसी दिखावे और सार्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती, लेकिन फरमान तो फरमान ही होता है, जहाँ इतनी महगाईं में लोग दो वक़्त सुकून से खा नहीं पाते वह बेचारे भी एक तिरंगा तो लाये ही होगें, राष्ट्रवाद दिखाना जो हैं।

आज हमारा राष्ट्रवाद बस इतना है कि हम किस तरह इसके बहाने एक दूसरे को ज़लील कर लें। ऐसी नफरत के चबूतरे पर खड़े राष्ट्र को यौमे आज़ादी की मुबारकबाद, इस दुआ के साथ कि हम एक दिन इस नींद से जाग जाएं।

हम उस रोज़ आज़ाद होंगे जिस रोज़ हम अपने तमाम देशवासियों की तरफ से दिलों का मैल धोकर उन्हें बराबर मानेंगे। आज़ादी उस रोज़ नुमाया होगी जिस रोज़ हम अपने लोगों से नहीं, शोषण, लूट और साम्राज्यवाद से नफरत करेंगे। फिलहाल वो सुबह दूर है। आज़ादी की वो सुबह अभी नहीं आई।

संवाद;मो अफजल इलाहाबाद

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