5राज्यों के होने वाले असेंबली चुनाव में अगर मुस्लिम वोटर की चुप्पी है तो किस पार्टी का होगा सफाया?

मुंबई
संवाददाता

मुस्लिम मतदाताओं के सहारे ही 1989, 1993, 2003 और 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनी।
मायावती भी 1995, 1997, 2002 और 2007 में दलित-मुस्लिम गठजोड़ से सूबे की सत्ता तक पहुंचीं।
2017 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस और बसपा को 19-19 फीसद मुस्लिम वोट मिले थे, जबकि 2012 में यह आंकड़ा क्रमश: 19 और 20 फीसद था।
जबकि सपा को 2017 में 45 फीसद और 2012 में 39 फीसद मुस्लिम वोट मिले थे।

इसके पहले के भी चुनावी आंकड़े यही दर्शाते हैं कि 90 के दशक से मुस्लिम मतदाताओं का सपा-बसपा से जुड़ाव बढ़ता गया।
मुस्लिमों के प्रति सपा के विशेष रुझान के चलते पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव को उनके विरोधी एक वक्त मौलाना मुलायम संबोधित करने लगे थे।

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सूबे की सत्ता तक भाजपा को पहुंचाने में भी मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हाथ है।
पहली बार 1991 में भाजपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में पहुंची और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने।
उस वक्त राम मंदिर आंदोलन चरम पर था। इस आंदोलन के चलते राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ।

मुस्लिम एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ गए तो हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हुआ।
इसके बाद तो 1997 में कुछ वक्त के लिए मायावती के साथ मिल कर भाजपा सत्ता में रही।
बाद में 1999 में राम प्रकाश गुप्ता और 2000 में राजनाथ सिंह भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रहे। 2002 के बाद से 2017 तक भाजपा को सत्ता के लिए इंतजार करना पड़ा।

2017 में एक बार फिर हिंदुत्व ने उछाल मारा। हिंदू वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों पर छाया हुआ था। इससे भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची।
मुस्लिम मतदाताओं की चुप्पी बिगाड़ रहा समीकरण
बीते पांच साल से सूबे में भाजपा की सरकार है।
इस अवधि में भाजपा सरकार ने ऐसे आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं और बाहुबलियों पर कानूनी शिकंजा कसा जिनसे अरसे से लोग परेशान थे।
यह इत्तेफाक कहा जाए या फिर किसी रणनीति का हिस्सा है कि भाजपा सरकार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों के प्रमुख चेहरा माने जाने वाले सपा सरकार में मंत्री रहे आजम खान को जेल की हवा खिला दी तो अवध क्षेत्र में प्रयागराज के बाहुबली अतीक अहमद को जेल में डाल कर उनका सारा रसूख खत्म कर दिया।
वहीं, पूर्वांचल में मुख्तार अंसारी जैसे बाहुबली नेता को भी योगी आदित्यनाथ सरकार ने उन पर लगे तमाम मुकदमों में जेल भेज दिया।
ये सब एक तरह से सूबे की एक बड़ी आबादी को संदेश था, जिसके बाद से मुस्लिम मतदाता चुप है।
उन तमाम घटनाओं पर भी मुस्लिम इस वक्त प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है, जो उसे उकसाने वाले हैं।
उनकी चुप्पी से भाजपा की वोट ध्रुवीकरण की रणनीति अब बिगड़ती दिख रही है। पहले-दूसरे चरण के मतदान में इस चुप्पी से जो ट्रेंड बनेगा, वही 2022 का नतीजा तय करेगा।

संवाददाता मो दादासाहब पटेल

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