मजबूरन मतलबतीनो कृषि कानून को वापस लेना मतलब वोट की खातिर किसानों के सामने नतमस्तक हो जाना?

नई दिल्ली

संवाददाता

आखिरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। मोदी सरकार को आमतौर पर कड़े फैसले लेने वाली और पीछे नहीं हटने वाली सरकार के रूप में जाना जाता है, लेकिन यह दूसरा फैसला है जो सरकार ने अपने खिसकते वोटों के कारण वापस लिया है।
मोदी सरकार ने वोटों के कारण सबसे बड़ी चोट देश के सवर्ण, ओबीसी के खिलाफ उस समय की थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी कानून को लेकर फैसला सुनाते हुए कहा था कि इस मामले में एकतरफा कार्रवाई नहीं हो सकती।
उस समय एससी वर्ग के लोगों ने बड़े आन्दोलन किए थे।
सरकार को उस समय भी लगा था कि अगर इस फैसले के खिलाफ संसद में कानून नहीं बनाया तो एससी-एसटी वर्ग के वोट खिसक जाएंगे। इसलिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संसद में कानून पास करवाया।
जिसमें प्रावधान है कि कोई भी एससी-एसटी वर्ग का व्यक्ति किसी सवर्ण या पिछड़े वर्ग के व्यक्ति के खिलाफ शिकायत करता है कि उक्त व्यक्ति ने मुझे जाति के आधार पर गालियां दी या प्रताड़ित किया तो उसे बिना जमानत के जेल जाना पड़ेगा।
आज उसी का परिणाम है कि कई एससी-एसटी वर्ग के लोग झूठी शिकायत कर देते हैं और दूसरा पक्ष बिना जमानत जेल चला जाता है।
इस फांस को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से निकाला था, जिसे मोदी सरकार ने सवर्ण और पिछड़े वर्ग में फिर से भर दिया।
अगर ये कहा जाए कि जिस तरह राजीव गांधी ने इंदौर की शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलकर जो पाप किया था, वही पाप मोदी सरकार ने किया है, तो गलत नहीं होगा।
मोदी सरकार के नाम पर कश्मीर में धारा 370 समाप्त करने का फैसला हो या तीन तलाक कानून से मुस्लिम महिलाओं को मुक्ति का मामला या अयोध्या में राम मंदिर विवाद को सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से सुलझाने की बात।
या कई अन्य उपलब्धियां सरकार के नाम लिखी जाएंगी तो यह दो बातें भी याद रहेंगी कि सरकार वोटों के कारण किस तरह झुक गई थी।
मोदी सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस उस स्थिति में लिए हैं, जबकि पूरे देश को लग रहा था कि इन तीनों कानूनों से किसानों को कोई नुुकसान नहीं होने वाला है।
केवल कुछ बेहद अमीर किसान इससे प्रभावित हो रहे थे, लेकिन वे किसान अपनी बातों पर अड़े रहे और सरकार अचानक झुक गई।
मजेदार बात यह है कि जब भी टेलीविजन पर किसान नेताओं से बात की जाती कि इन कानूनों से आपको क्या नुकसान होगा या इन कानूनों में कहां लिखा है कि आपकी जमीन छीन ली जाएगी?
उसका यह किसान ठीक से जवाब भी नहीं दे पाते थे, लेकिन दिल्ली के आसपास डेरा डाले बैठे थे कि अचानक प्रधानमंत्री मोदी के उदबोधन के बाद उनकी देव दिवाली मन गई।
कुल मिलाकर कुछ जिद्दी किसान इस मुद्दे पर जीत गए, लेकिन सरकार अपने वोट बचाने में संभव है कामयाब हो जाएगी। राजनीति इसी को कहते हैं।
अपने फायदे के लिए किसी बात को नाक की लड़ाई नहीं बनाया जाता। सरकार के इस फैसले से कई विरोधी दल भी पस्त हो गए हैं।
उन्हें लग रहा था कि वे किसानों के सहारे विधानसभा चुनाव जीत लेंगे। उनके मंसूबों पर भी पानी फिर गया है।
अब भाजपा के नेता उन क्षेत्रों में भी जा सकेंगे जहां इन चंद किसान नेताओं का वर्चस्व था और वे उन्हें अपने क्षेत्र में नहीं घुसने दे रहे थे। सरकार ने वोट की खातिर यह फैसला दूरदृष्टि के आधार पर लिया है।

साभार:महेश कजोडिया

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