पाखंडवाद की घोर प्रथाएं:अंग्रेजों ने कितने पाखंडों पर रोक लगाई ?उसपर एक नजर डालें !

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रिपोर्टर:-

1:- रथयात्रा :- जगन्नाथ में हर तीसरे वर्ष यह यात्रा निकाली जाती है जिसमें स्वर्ग पाने के चक्कर में रथ के पहिये के नीचे आकर सैँकडों लोगों की जान चली जाती थी,।
अँग्रेजों ने इस कुप्रथा को एक सख्त कानून बना कर बनाकर बंद कराया* ।

2:-काशीकरबट :- मनुवादियों के कहने पर काशी धाम में ईश्वर प्राप्ति हेतु विश्वेश्वर के मंदिर के पास कुँए में कूद कर जान देते थे इस कुप्रथा को भी अँग्रेजों ने एक नया कानून बना कर बंद किया।
3:-चरक पूजा :- काली के मोक्षाभिलाषी उपासक की रीड की हड्डी में लोहे की हुक फसा कर चर्खी में घुमाया जाता है जब तक कि उसके प्राण न निकल जायें इस कुप्रथा को 1863 में एक नया कानून बनाकर बंद कराया।
4:- गंगा प्रवाह :- अधिक अवस्था बीत जाने पर भी संतान न होने पर गंगा को पहली संतान भेट करने की मनोती पूरी होने पर निष्ठुर होकर जीवित बच्चे को गंगा में बहा देना कितनी कठोर कुप्रथा थी इस को भी 1835 में एक नया कानून बनाकर बंद किया ।
5:- नरमेध यज्ञ:- ऋग्वेद के आधार पर अनाथ या निर्धन बच्चे की यज्ञ में बली चढाने की प्रथा को 1845 मे नया एक्ट 21 बनाकर बंद किया गया।
6:- महाप्रस्थान:- पानी में डूब कर या आग मे जलकर ईश्वर प्राप्ती की इच्छा से जान देने की प्रथा भी एक नया कानून बनाकर बंद की।
7:-तुषानल :- किसी पाप के प्रायश्चित के कारण भूसा या घास की आग में जलकर मरने की प्रथा नया कानून बनाकर बंद की।
8:-हरिबोल :- यह प्रथा बंगाल में प्रचलित थी। मरणासन्न व्यक्ति को जब तक गोते खिलाये जाते थे तब तक वह मर न जाये और हरिबोल के नारे लगाते थे ।
यदि वह नही मरा तो भी उसे वहीं तड़फने के लिए छोड़ देते थे उसे फिर घर नहीं लाते थे 1831 में एक नया कानून बना कर इस कुप्रथा को बंद कराया गया ।
9:- नरबलि :- अपने इष्ट की प्राप्ति पर उस ईष्ट को प्रसन्न करने के लिए मानव की सीधी बली को भी अंग्रेजों ने बंद किया लेकिन इस कुप्रथा के यदाकदा भारत मे आज भी उदाहरण देखने को मिलते है।
10:- सतीदाह- पति के मरने पर पति की चिता के साथ जल कर मरने की कुप्रथा को 1841 में बंद किया।

11:- कन्यावध :- उडीसा व राजस्थान के अपने आपको कुलीन क्षत्रिय मानने वाले कन्या पैदा होते ही उसे मार देते थे इस भय से कि इसके कारण उन्हे किसी का ससुर या साला बनना पडेगा अतः1870 में कानून बनाकर इस कुप्रथा को बंद किया गया ।
12:- भृगुत्पन्न :- यह गिरनार या सतपुडा में प्रचलित थी ।
अपनी माताओं की मनौती की हे- महादेव! हमें संतान हुई तो पहली संतान आपको भेंट देंगे और इसके तहत नव- युवक अपने को पहाड़ से कूदकर जान देते थे कानून बनाकर बंद की ।
ये है मनुवादियों द्वारा बनाई मूलनिवासी के लिए कुप्रथाएँ थी।
किसी भी कुप्रथा का हिस्सा कभी मनुवादी या उसके परिवार के सदस्य नही होते थे इन सब तरह की कुप्रर्थाओँ को मनुवादियों ने अन्य जातियों के लोगों के लिए बनाया हुआ था , खासकर मूलनिवासीयोँ के लिए ऐसी हजारों कुप्रर्थाएँ थी जिन मे से अभी भी बहुत सी गांव देहात या जहां अनपढ़ता है उन क्षेत्रों मे आज भी प्रचलित हैं।

OBC SC ST भाईयो जागो पाखंडवाद को त्यागो कहीं हम भूल न जाएँ !

वर्ण में शूद्र, शूद्र में जाति, जाति में क्रमिक उंच नीच और मनुवादियों के आगे सारे नींच ।
शूद्रOBC अवर्ण(SC/ST)जाति तोड़ो समाज जोड़ो
अंधविश्वास, पाखंड, ढोंग से मुक्त हो भारत अपना।

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