देश में आर्थिक तबाही मची है इस बारेमे उन्हेंक्यो नही खबर है ? मोदी कह रहे हैं सब ठीक है ?

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रिपोर्टर :- 

मुल्क जबरदस्त मआशी (आर्थिक) तबाही का शिकार हो रहा है,बेरोजगारी नुक्ता-ए-उरूज (चरम बिन्दू) पर पहुंच गई, तीन करोड़ पच्चीस लाख नौकरियां खत्म होने की कगार पर, आटोमोबाइल, मैन्युफैक्चरिंग और कांस्ट्रक्शन इंडस्ट्री पहले से ही मंदी के दौर में थी अब कोयला, क्रूड (कच्चा तेल), नेचुरल गैस, सीमेंट, बिजली समेत आठ सनअतों (उद्योगों) को अगस्त में जबरदस्त झटका लगा है।

गुजिश्ता चार साल में यह तमाम सनअतें प्रोडक्शन के मामले में अपने सबसे निचले पायदान तक पहुंच चुकी हैं। हीरा कारोबार दम तोड़ रहा है।
अभी तक हर साल तकरीबन 13 हजार काश्तकार ही कर्ज में फंस कर खुदकुशी किया करते थे अब कारपोरेट सेक्टर की कम्पनियों के चीफ एक्जीक्यूटिव अफसरान (सीईओ) भी खुदकुशी करने लगे हैं।
कांग्रेस तर्जुमान गौरव वल्लभ के मुताबिक पिछले तीन महीनों में सोलह (16) कारपोरेट कम्पनियों के सीईओ खुदकुशी कर चुके हैं।

इनमें एक कैफे काफी डे के मालिक और सीईओ सिद्धर्थ बंगलौर के थे, बाकी सभी पन्द्रह मोदी के गुजरात के हैं।
हीरा कारोबारियों का कहना है कि 2008 से अब तक ग्यारह (11) सालों में हीरा कारोबार सबसे निचली सतह पर पहुंच गया है।
तीन सालों में हीरे के चालीस हजार से ज्यादा माहिर कारीगरों का रोजगार छिन चुका है।
अपने मुलाजमीन को हर साल दीवाली के मौके पर कारें, मकानात, एफडी, सोने के जेवरात जैसे बडे़-बडे़ तोहफे देने के लिए मशहूर गुजरात के हीरा कारोबारी सावाजी ढोलकिया का कहना है कि इस बार दीवाली पर तोहफे की शक्ल में अपने मुलाजमीन को एक-एक किलो मिठाई के डिब्बे तक देना मुश्किल हो रहा है।
इस सूरतेहाल के बावजूद ह्यूस्टन के एनआरजी स्टेडियम में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी दर्जनों जुबानों में चीख-चीख कर कह रहे थे कि भारत में सब ठीक-ठाक है तो क्या मोदी अमरीका जाकर भी अपने मुल्क के सिलसिले में झूठ बोल रहे थे?

मुल्क की आर्थिक तबाही की वजह सिर्फ वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की जिद और खुद को ही सबसे ज्यादा काबिल समझना है।
साढे पांच सालों में एक भी खबर ऐसी नहीं आई है ।
जिससे यह पता चल सके कि मआशी (आर्थिक) मामलात में नरेन्द्र मोदी ने किसी भी माहिरे मआशियात (आर्थिक मामलात के विशेषज्ञ) से कोई मश्विरा किया हो,
उनकी सरकार आने के बाद मआशी मामलात के माहिर रिजर्व बैंक के दो गवर्नर रघुराम राजन और उर्जित पटेल अपनी इज्जत बचाकर इस्तीफा देकर भाग चुके हैं।
फाइनेंस सेक्रेटरी ने सरकार से हाथ जोड़ लिए और अपना तबादला कम अहमियत की वजारत तवानाई (ऊर्जा) के सेक्रेटरी के ओहदे पर करा लिया। नीति आयोग में कोई टिकता नहीं है।

मोदी की फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण को मआशी (आर्थिक) मामलात की कोई जानकारी नहीं है।
दोबारा मोदी सरकार बनने के बाद उन्होने बजट पेश किया और चार महीनों के अंदर ही दो बार बजट प्रोवीजंस में बडे़ पैमाने पर तब्दीलियां कर चुकी है।
रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास तारीख (इतिहास) के माहिर है, मआशी (आर्थिक) मामलात में उनका कभी कोई दखल नहीं रहा,
लेकिन मोदी ने उन्हें रिजर्व बैंक आफ इंडिया का गवर्नर बना रखा है।

क्योकि मोदी को देश के तमाम संवैधानिक इदारों में ऐसे लोग चाहिए जिनमें रीढ की हड्डी नाम की कोई चीज न हो, वह बस मोदी की हां में हां मिलाते रहें।
निर्मला सीतारमण की काबलियत का आलम यह है कि गाड़ियां न बिकने की वजह से मुल्क का आटोमोबाइल सेक्टर भारी खसारे में पहुंच गया, लोगों की नौकरियां जाने लगी तो उन्होने बयान दे दिया कि ऊबर और ओला जैसी ‘कैब सर्विसेज’ की वजह से कारों की बिक्री में कमी आई है।

मोहतरमा समझती हैं कि इन दोनों ‘कैब सर्विसेज’ में बैल गाड़ियां चलती हैं।
वह यह भी नहीं समझ रही कि दोनों में जो कारें चलती हैं वह आसमान से नहीं टपकती इसी देश की कम्पनियों से खरीदी जाती हैं।
उन्होने बेअक्ली भरा बयान तो दे दिया लेकिन यह नही बताया कि कारों की बिक्री मे कितनी कमी आई है और ऊबर व ओला के पास कितनी कारें चल रही हैं?
मोदी सरकार ने रिजर्व बैंक आफ इंडिया की गर्दन दबा कर रिजर्व फण्ड का जो करोड़ो रूपया वसूला था,
मोदी के कहने पर निर्मला सीतारामण ने पौने दो लाख करोड़ बडी कम्पनियों को टैक्स में छूट की शक्ल में दे दिया।

अब पब्लिक सेक्टर की कम्पनियां नीलामी पर लगी है।
उनकी अरबों की जमीन और दूसरी इमलाक मोदी के करीबी कारोबारियों को दी जा रही है।
यह नहीं सोचा जा रहा है कि उनसे मिलने वाली रकम एक साल में खर्च हो जाएगी।

या मोदी के करीबी कारपोरेट घरानों को दे दी जाएगी उसके बाद पैसा कहां से आएगा? देश में मआशी (आर्थिक) मामलात खराब होने की वजह से मायूसी छाई हुई है। लेकिन मोदी ह्यूस्टन तक में करोड़ों डालर खर्च करके ‘हाउडी-हाउडी’ खेल रहे हैं।
राहुल गांधी का बयान सच माना जाए तो इस प्रोग्राम पर डेढ लाख करोड़ रूपए खर्च किया गया है।
हाउडी-हाउडी’ खेल कर मोदी वापस तो आ गए लेकिन साथ में मुल्क के लिए लाए क्या?

कबड्डी जैसे मामूली खेल के बाद मिलने वाले सर्टिफिकेट की शक्ल में एक कागज का टुकड़ा भी तो नहीं मिला।
देश तबाह हो रहा है लोगों के पास दीवाली मनाने का पैसा नहीं है लेकिन अक्ल के अंधे लोग खुश हैं कि मोदी ने पाकिस्तान को उसकी हैसियत बता दी।
उनमें दूसरी खुशी यह है कि मोदी सरकार में मुसलमानों को दबाकर रखा जा रहा है।

ऐसे बद अक्लों को कौन समझाए कि मुसलमान जैसे थे वैसे ही रह रहे हैं मआशी (आर्थिक) तंगी का शिकार मुल्क का अट्ठारह (18) फीसद मुसलमान नहीं हो सकता।
क्योंकि मुसलमान जो कारोबार करते हैं उनमें मंदी नहीं आती, साइकिल रिपेयरिंग करने, ई-रिक्शा चलाने, नलों की रिपेयरिंग करने, बिजली का काम करने, कपडे़ सिलने जैसे धंधों में मंदी कैसे आ सकती है।
मुसलमानों और पाकिस्तान के नाम पर खुश होने वाले को यह भी एहसास नहीं है कि मुल्क का सोलह-अटठारह फीसद मुसलमान मआशी (आर्थिक) तबाही में भी पंक्चर जोड़ कर अपना घर चला लेगा,
लेकिन असल नुक्सान तो अस्सी-बयासी फीसद आबादी का हो रहा है वह क्या करेंगे।

पिछले कई सालों से गुजरात के हीरा व्यापारी सावाजी ढोलकिया दीवाली के मौके पर अपनी कम्पनी में काम करने वाले लोगों से बाकायदा पूछ कर उनकी जरूरत के मुताबिक कारें, फ्लैट, ज्वेलरी और नकद पैसा एफडी की शक्ल में तोहफे में दिया करते थे, अब ढोलकिया का कहना है कि इस साल दीवाली पर एक-एक किलो मिठाई का डिब्बा देना भी मुश्किल हो रहा है।
हीरा इंडस्ट्री में बडे़ पैमाने पर छटनी हुई है।
हमने अपने साथियों का ख्याल करके किसी को निकाला नहीं लेकिन अब बहुत मुश्किल हो रही है।
यह कोई अपोजीशन पार्टी का इल्जाम नहीं है,
मोदी की ही कामर्स मिनिस्ट्री की रिपोर्ट है कि पिछले चार-पांच सालों में सबसे बड़ा झटका कोयला इंडस्ट्री से सरकार को लगा है।

जिसके प्रोडक्शन में साढे आठ (8.6) फीसद से ज्यादा की कमी आई है जो एक रिकार्ड है।
कोयला के अलावा क्रूड में साढे पांच (5.5) फीसद, नेचुरल गैस में पांच फीसद और सीमेट में तीन फीसद की गिरावट दर्ज की गई है।
यह आदाद व शुमार (आंकडे़) अगस्त महीने के हैं।
अगर नेशनल हाईवे अथारिटी सडकें न बना रही होती तो कांस्ट्रक्शन इंडस्ट्री बंद होने की वजह से आधी से ज्यादा सीमेंट फैक्टरियां बंद हो चुकी होती और मजदूर सड़क पर आ जाते।

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