देश का संविधान तमाम शहरियों को इस बात की इजाजत देता है कि वो अपने मर्जी व पसंद का मजहब इख्तियार करे

मजहब की तब्दीली और सुप्रीम कोर्ट

देश का संविधान, तमाम शहरियों को इस बात की इजाजत देता है कि वह अपनी मर्जी और पसंद का मजहब अख्तियार करे, उसपर अमल करे और उसकी तब्लीग (प्रचार-प्रसार) करे। बीजेपी सरकारें आने के बाद आम शहरियों को संविधान से मिले इस हक को खत्म करने की कोशिशें शुरू हुईं।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत बीजेपी सरकारों वाले कई प्रदेशों में मजहब तब्दील करने और पाबंदी लगाने के कानून बनाए जाने लगे। अवाम के इस संवैधानिक हक को छीनने के लिए ‘जबरन, लालच और धोका’ जैसे अल्फाज का सहारा लिया गया। मतलब यह कि संविधान के जरिए दिया गया एक अहम हक अवाम से छीन लिया गया।

पहले तो हिन्दुओं के इसाई और इस्लाम मजहब में शामिल होने पर पाबंदी लगाई गई फिर बात इतनी आगे बढी कि अगर कोई हिन्दू पूजापाठ तर्क करके बौद्ध बनना चाहे तो उसपर भी रोक लगाने की कार्रवाई शुरू हो गई है। डाक्टर अम्बेडकर ने जब हिन्दू मजहब छोड़कर बौद्ध मजहब अपनाया था तो उस जलसे में बाइस अहद (प्रतिज्ञाएं) लिए गए थे जिनमें कहा गया था कि हम बौद्ध धर्म अपना रहे हैं।

इसलिए अब देवी-देवताओं की पूजा नहीं करेंगे और मंदिरों में नहीं जाएंगे। यह अहद पचासों साल से हर साल दोहराए जा रहे हैं। लेकिन इस साल दिल्ली में ‘बौद्ध दीक्षा’ के सालाना जलसे में यह अहद दोहराए गए तो हिन्दुत्व के फर्जी ठेकेदारों ने आसमान सर पर उठा लिया। अमित शाह की पुलिस ने रिपोर्ट लिख ली और केजरीवाल सरकार के वजीर राजेन्द्र पाल गौतम जो उस जलसे की सदारत कर रहे थे केजरीवाल ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। पुलिस ने उन्हें थाने पर बुलाकर कई दिनों तक पूछगछ की।

अब चौदह नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर कहा कि मजहब तब्दील करना एक खतरनाक और संगीन मसला है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर भारत सरकार को नोटिस भेजकर बाइस नवम्बर तक जवाब मांगा और यह कहा कि अट्ठाइस नवम्बर को इस मामले की सुनवाई होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने वार्निंग दी कि अगर इस तरह मजहब की तब्दीली का काम रोका न गया तो बहुत पेचीदा सूरतेहाल पैदा हो सकती है। मुल्क की सिक्योरिटी शहरियों के मजहब और जमीर की आजादी के बुनियादी हक के लिए जबरदस्त खतरा पैदा हो सकता है। आम लोगों के मजहब तब्दील करने के बुनियादी हक को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने नोटिस में ‘जबरन, लालच या धोका’ जैसे अल्फाज का इस्तेमाल किया है।

इस सिलसिले की अपील सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली बीजेपी के लीडर अश्विनी उपाध्याय ने दायर की थी। अश्विनी उपाध्याय का ताल्लुक आरएसएस और बीजेपी से बताया जाता है। वह दिल्ली बीजेपी के तर्जुमान रहे हैं और जंतर-मंतर पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने का जो जलसा हुआ था वह अश्विनी उपाध्याय ने ही बुलाया था। उस मामले में उपाध्याय गिरफ्तार भी हुए थे, जो जमानत पर हैं।

उनकी अपील के पीछे उनकी क्या मंशा है, यह भी सबकी समझ में आता है, लेकिन हैरत यह है कि सुप्रीम कोर्ट से भी उनकी मंशा को तकवियत मिल रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने अश्विनी उपाध्याय से यह नहीं पूछा कि उन्होने जो अपील की है उसमें क्या किसी ऐसे सर्वे का हवाला दिया गया है जिस सर्वे से पता चलता हो कि देश मंे कितने लोगों को ‘जबरन, लालच या धोका’ देकर उनका मजहब तब्दील कराया गया है। अश्विनी उपाध्याय बीजेपी के हैं,

वह तो यह हवा-हवाई दावा कर सकते हैं कि अगर मजहब तब्दील करने पर पाबंदी न लगी तो देश में हिन्दू बहुत जल्द अकलियत में आ जाएंगे। इस देश में हिन्दू अकलियत में कैसे आ सकते हैं यह सवाल सुप्रीम कोर्ट ने नहीं किया। आखिर रियाजी (गणित) भी कुछ होती है कि नहीं। आजादी के बाद से हिन्दू मजहब छोड़कर लोग इसाई, बौद्ध और इस्लाम मजहब कुबूल करते आए हैं, इसके बावजूद पचहत्तर सालों में मुल्क में बौद्धों, इसाइयों और मुसलमानो की तादाद बीस फीसद के अंदर ही है फिर जल्द ही हिन्दू अकलियत में आ जाएगा इस दावे का आखिर क्या जवाज (औचित्य) है।

सालीसिटर जनरल तुषार मेहता, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस हेमा कोहली की बेंच के सामने पेश तो हुए थे मरकजी सरकार की तरफ से, लेकिन उन्होंने जो दलीलें दीं वह सब अश्विनी उपाध्याय की हिमायत में थीं। मसलन उन्होने कहा कि आदिवासी अक्सरियती इलाकों में बड़ी तादाद में लोग अपना मजहब तब्दील कर रहे हैं। उन इलाकों में गेहूं, चावल देकर भी लोगों का मजहब तब्दील कराया जाता है। महज गेंहू चावल देकर आदिवासी अपना मजहब छोड़ रहे हैं यह न सिर्फ एक संगीन इल्जाम है बल्कि आदिवासियों की तौहीन भी है।

अगर महज गेंहू चावल पर ही कोई अपना ईमान धर्म तर्क कर रहा होता तो मोदी हुकूमत तो कोविड के दौर से ही देश के अस्सी करोड़ लोगों को अपनी तस्वीर छपे थैले में महीने में दो बार गेंहू और चावल तकसीम कर रही है तो अब तक कम से कम मुफ्त गल्ला पाने वाले बौद्ध, ईसाई और मुसलमान तो अपना मजहब छोड़ कर हिन्दू बन चुके होते। अश्विनी उपाध्याय ने अपनी अपील में कहा कि मुल्क में काला जादू, तवाहुम परस्ती (अंधविश्वास) और करिश्मों के जरिए लोगों का मजहब तब्दील करने के वाक्यात हर हफ्ते पेश आते हैं।

एक भी जिला ऐसा नहीं है जहां धोकाधड़ी और धमकी के जरिए लोगों का मजहब तब्दील न कराया जा रहा हो। उपाध्याय ने इसका कोई रिकार्ड पेश नहीं किया इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बात मान ली।
राजस्थान के एक स्कूल में दलित बच्चे ने पानी का मटका छू लिया तो सवर्ण टीचर ने उसे इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। उत्तरप्रदेश के कुछ स्कूलों में दलित बच्चों को मिड डे मील की रोटी फेंक कर दी जाती है और अगर खाना पकाने वाली ख्वातीन दलित होती हैं तो सवर्ण बच्चे उसका पकाया खाना नहीं खाते, यह खबरें पिछले पांच-छः महीने के अंदर मीडिया में छाई रहीं।

अब अगर इस तरह के बर्ताव का शिकार बनने वाले दलित परिवार हिन्दू मजहब छोड़कर बौद्ध, ईसाई या इस्लाम मजहब में शामिल हो जाए तो इसमें ‘जबरन, धोकाधड़ी और लालच’ कहां से आएगा। अश्विनी उपाध्याय की अपील दरअस्ल कुछ सवर्ण हिन्दुओं में फैली छुआछूत की बीमारी पर पर्दा डालने के लिए है। लेकिन अफसोस यह कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं की बात मानते हुए भारत सरकार को नोटिस जारी कर दिया। अश्विनी से पूछा जाना चाहिए था कि वह ऐसे मामलात की फेहरिस्त पेश करें जिनमें किसी हिन्दू का जबरदस्ती, लालच या धमकी देकर मजहब तब्दील कराया गया हो।

यूपी और मध्य प्रदेश जैसी रियासतों में अब अगर कोई अपने संवैधानिक हक के तहत मजहब तब्दील करता है तो ऐसा करने वाले की शिकायत के बजाए हिन्दुत्ववादी तंजीमों की शिकायत पर पुलिस मामले को जबरन, लालच और धमकी देकर मजहब तब्दील करने का मामला बना देती है।

यह तो सरासर संविधान की खिलाफवर्जी है और हर शहरी को मिले हुए संवैधानिक हक को छीनने जैसी बात है। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में बहुत ही सोच समझ कर कार्रवाई करनी चाहिए। हवा हवाई दावों पर अगर अदालती कार्रवाइयां होने लगीं तो देश का संविधान नहीं बचेगा।

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