क्यों करते हो मद्रसो की बदनामी ,ये तो लेटेस्ट संघी प्रोजेक्ट है कि कितना खतरनाक है मद्रसा,क्या सिर्फ यही खतरनाक है या और कुछ जगहें है खतरनाक?

हिन्दूओ का दिमाग़ ज़हरीला नहीं था, अब ज़हरीला बनाया जा रहा है.मदरसा ख़तरनाक है : ये लेटेस्ट संघी प्रोजेक्ट” है..कितना ख़तरनाक़ है मदरसा? क्या मदरसे ही ख़तरनाक़” है या और भी ख़तरनाक़ जगहें” है?

अकसर मदरसों में क्या पढ़ाया जाता है : बेसिक ज़बान जो पढ़ाई जाती है वो है अरबी।अरबी इसीलिए पढ़ाई जाती है क्योंकि कुरआन मजीद और इस्लामिक ज्यूरिस्प्रूडेंस पढ़ाया जाता है।.इस्लामिक स्कॉलर बनने के लिए अरबी जानना ज़रूरी है।कम से कम 10 साल अरबी सीखना ज़रूरी है,इसके अलावा.मदरसों में फ़ारसी, उर्दू भी पढ़ाई जाती है।

ये था इस्लामिक स्कॉलर का कोर्स,इसके अलावा जनरल कोर्स के स्टूडेंट भरे होते है।.पर कुछ मदरसे होते है जो केवल अरबी, कुरआन और इस्लामिक ज्यूरिस्प्रूडेंस ही पढ़ाते है।और ये 100 साल से ज़्यादा से पढ़ा रहे है।मदरसे भारत के सबसे “lवर्सटाइल स्कूल” में से एक है।

क्या दूसरे मज़हबों में भी ऐसे स्कूल है जो उस धर्म का स्कॉलर बनाते है? जानिए.

भारत में वेद, बहुत सारे उपनिषद के स्कूल मौजूद है. मगर यहाँ विज्ञान की पढ़ाई नही है।
उर्दू सीखने के बाद मैं ख़ुद एक वेद स्कूल में एडमिशन लूंगा।
BHU में “हिन्दू कर्मकांड” का कोर्स चलता है.डिग्री है
संस्कृत कॉलेज में बेश्तर संस्कृत में हिन्दू टेक्स्ट है। मन्दिर कर्मकांड” का कोर्स चलाते है मगर.विज्ञान नही पढ़ाते!
बौद्ध मॉनेस्ट्री में बुद्धिस्ट स्कॉलर बनाए जाते है। मॉनेस्ट्री में विज्ञान का कोई नामोनिशां नही होता।
चर्च में थियोलॉजी का कोर्स होता है
पादरी बनने के लिए थियोलॉजी पढ़ना अनिवार्य है। लेकिन चर्च में भी कोई विज्ञान नही पढ़ाया जाता है।

ठीक ऐसे ही अलग अलग मज़हबों में अपने अपने स्कूल” है जो ख़ुद के कोर्स चलाते है और हूकूमत का कोई दख़ल नही होता..ये अधिकार संविधान के तहत है।हिन्दूओ को भी बराबर के अधिकार है। अपितु दिक़्क़त केवल मदरसों से है?

अगर अरबी, फ़ारसी, उर्दू देखते ही आपको दहशतगर्दी याद आती है। तो ज़्यादातर हिन्दू विद्वानों को दहशतगर्द कहना पड़ेगा। क्योंकि ये हिन्दू विद्वान अरबी, फ़ारसी, उर्दू के आलिम थे/है..और भारत मे “सबसे बड़े दहशतगर्द ब्रिटिश” तो इंग्लिश बोलने वाले थे।अरबी वाले तो अपनी जान कुर्बान कर रहे थे।

अगर मदरसे नही होते तो ये देश आज़ाद नही होता..अगर गणपति, दुर्गापूजा के पंडाल नही लगते तो आज़ादी की लड़ाई की कोई सोच भी नही सकता था।आप जिन धर्मग्रंथों को आज पढ़ रहे है उन सबका अरबी, फ़ारसी और उर्दू में अनुवाद सन 1000-1700 के बीच हो चुका था। और हम हिन्दूओ के बाप दादा इन ग्रन्थों को पहले अरबी, फ़ारसी, उर्दू में ही पढ़े।.क्योंकि उन्हें संस्कृत पढ़ने का हक़ नहीं दिया गया था।अरबी, फ़ारसी, उर्दू ने हमारे पुरखों को हिन्दू धर्म को जानने का बखुबी मौक़ा दिया।हमे शुक्रगुज़ार होना चाहिए।

संघी नफ़रत आपसे आपके पुरखों का अपमान करवा रही है।पितृपक्ष चल रहा है : बाप दादा से मुआफ़ी मांगिए..वरना इस ग़ुनाह का अज़ाब आप बर्दाश्त नही कर पाएंगे।

संवाद


कृष्णनअय्यर

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