ओ तो हक परस्त बादशाह थे,ऐसे महान शासक औरंगजेब द्वारा किया गया एक ऐसा इंसाफ जिसे देश की जनता से क्यों छुपाया जा रहा है?

सय्यद मो रफीक अहमद

हक परस्त मुस्लिम बादशाह महान शासक ओरंगजेब द्वारा किया गया इन्साफ , देश की जनता भूल गई है।

आलमगीर काशी बनारस की एक ऐतिहासिक मस्जिद (धनेडा की मस्जिद) का यह एक ऐसा इतिहास है जिसे इतिहास के पन्नो से तो हटा दिया गया है लेकिन निष्पक्ष इन्सान और हक़ परस्त लोगों के दिलो से चाहे वो किसी भी कौम का इन्सान क्यों न हो जिसे कतई मिटाया नहीं जा सकता, और क़यामत तक मिटाया नहीं जा सकेगा।

औरंगजेब आलमगीर की हुकूमत में काशी बनारस में एक पंडित की लड़की थी जिसका नाम शकुंतला था,
उस लड़की को एक मुसलमान जाहिल सेनापति ने अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा, और उसके बाप से कहा कि तेरी बेटी को डोली में सजा कर मेरे महल पे 7 दिन में भेज देना। पंडित ने यह बात अपनी बेटी से कही, उनके पास कोई रास्ता नहीं था और पंडित से बेटी ने कहा कि 1 महीने का वक़्त ले लो कोई भी रास्ता निकल जायेगा।

पंडित ने सेनापति से जाकर कहा कि, मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं 7 दिन में सजाकर लड़की को भेज सकूँ, मुझे महीने भर का वक़्त दो. सेनापति ने कहा ठीक है! ठीक एक महीने के बाद भेज देना। पंडित ने अपनी लड़की से जाकर कहा वक़्त मिल गया है ।अब”लड़की ने मुग़ल सहजादे का लिबास पहना और अपनी सवारी को लेकर दिल्ली की तरफ़ निकल गई, कुछ दिनों के बाद दिल्ली पहुँची, वो दिन जुमे का दिन था,
और जुमे के दिन औरंगजेब आलमगीर नमाज़ के बाद जब मस्जिद से बहार निकलते तो लोग अपनी फरियाद एक चिट्ठी में लिख कर मस्जिद की सीढियों के दोनों तरफ़ खड़े रहते, और हज़रत औरंगजेब आलमगीर वो चिट्ठियाँ उनके हाथ से लेते जाते, और फिर कुछ दिनों में फैसला (इंसाफ) फरमाते, वो लड़की (शकुंतला) भी इस क़तार में जाकर खड़ी हो गयी,

उसके चहरे पे नकाब था, लड़के का लिबास (ड्रेस) पहना हुआ था, जब उसके हाथ से चिट्ठी लेने की बारी आई तब हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने अपने हाथ पर एक कपडा डालकर उसके हाथ से चिट्ठी ली
तब वो बोली महाराज! मेरे साथ यह नाइंसाफी क्यों? सब लोगों से आपने सीधे तरीके से चिट्ठी ली और मेरे पास से हाथों पर कपडा रख कर ?

तब औरंगजेब आलमगीर ने फ़रमाया कि इस्लाम में ग़ैर मेहरम (पराई औरतों) को हाथ लगाना भी हराम है।और मैं जानता हूँ कि तू लड़का नहीं बल्कि एक जवान लड़की है।शकुंतला बादशाह के जवाब पर हैरान हो गई,उनके साथ कुछ दिन तक ठहरी, और अपनी फरियाद सुनाई, बादशाह हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने उससे कहा बेटी! तू लौट जा तेरी डोली सेनापति के महल पहुँचेगी अपने वक़्त पर, शकुंतला सोच में पड गयी कि यह क्या?

वो अपने घर लौटी ।तब उसके बाप पंडित ने पूछा क्या हुआ बेटी? तो वो बोली एक ही रास्ता था मै हिन्दोस्तान के बादशाह के पास गयी थी, लेकिन उन्होंने भी ऐसा ही कहा कि डोली उठेगी, लेकिन मेरे दिल में एक उम्मीद की किरण है, वो ये है कि मैं जितने दिन वहाँ रुकी बादशाह ने मुझे 15 बार बेटी कह कर पुकारा था। एक बाप अपनी बेटी की इज्ज़त नीलाम नहीं होने देगा।

फिर वह दिन आया जिस दिन शकुंतला की डोली सजधज के सेनापति के महल पहुँची, सेनापति ने डोली देख के अपनी अय्याशी की ख़ुशी में फकीरों को पैसे लुटाना शुरू किया…। जब पैसे लुटा रहा था तब एक कम्बल-पोश फ़क़ीर जिसने अपने चेहरे पे कम्बल ओढ रखी थी… उसने कहा “मैं ऐसा-वैसा फकीर नहीं हूँ, मेरे हाथ में पैसे दे।

उसने हाथ में पैसे दिए और उन्होंने अपने मुह से कम्बल हटाया तब सेनापति देखकर हक्का बक्का रह गया। क्योंकि उस कंबल में कोई फ़क़ीर नहीं था बल्कि औरंगजेब आलमगीर खुद सामने थे। उन्होंने कहा कि तेरा एक पंडित की लड़की की इज्ज़त पे हाथ डालना मुसलमान हुकूमत पे दाग लगा सकता है, और औरंगजेब आलमगीर ने इंसाफ फ़रमाया। 4 हाथी मंगवाकर सेनापति के दोनों हाथ और पैर बाँध कर अलग अलग दिशा में हाथियों को दौड़ा दिया गया!
और सेनापति को चीर दिया गया।

फिर आपने पंडित के घर पर एक चबूतरा था उस चबूतरे के पास दो रकात नमाज़ नफिल शुक्राने की अदा की, और दुआ की कि , “ऐ मेरे अल्लाह! मैं तेरा शुक्रगुजार हूँ, कि तूने मुझे एक ग़ैर इस्लामिक लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए, इंसाफ करने के लिए चुना…। फिर औरंगजेब आलमगीर ने कहा “बेटी! ग्लास भर पानी लाना!

लड़की पानी लेकर आई, तब आपने फ़रमाया कि:“जिस दिन दिल्ली में मैंने तेरी फरियाद सुनी थी उस दिन से मैंने क़सम खायी थी कि जब तक तेरे साथ इंसाफ नहीं होगा पानी नहीं पिऊंगा…। तब शकुंतला के बाप (पंडित जी) और काशी बनारस के दूसरे हिन्दू भाइयों ने उस चबूतरे के पास एक मस्जिद तामीर की, जिसका नाम धनेडा की मस्जिद रखा गया। पंडितों ने ऐलान किया कि ये बादशाह औरंगजेब आलमगीर के इंसाफ की ख़ुशी में हमारी तरफ़ से इनाम है… और सेनापति को जो सजा दी गई वो इंसाफ़ है। जो एक सोने की तख़्त पर लिखा गया था जो आज भी धनेडा की मस्जिद में मौजुद है। याद रहे। कि मुसलमान मुगल बादशाह हक परस्त शासक थे। कभी किसी की अवैध जमीन हथियाकर या मंदिर तोड़ कर कभी मस्जिद नही बनाई ना बनाना चाहते थे। आज के दौर में मंदिर मस्जिद ,हिंदू और मुसलमान में नफरत की राजनीति चल रही है। खरा इतिहास को तोड़ मरोड़कर बदल दिया जा रहा है झूठ परोसा जा रहा है इसे आज के युवाओ को समझ लेने और सच्चाइयों को जानने की जरूरत है।

SHARE THIS

RELATED ARTICLES

LEAVE COMMENT

अफजल इलाहाबाद क्या आप जानतें हैं कि विश्व बैंक के मालिक सिर्फ़ 13 परिवार हैं ? जी हां विश्व बैंक सरकारी बैंक नहीं है, इसमें...

READ MORE

मिडल ईस्ट में ये एक पिद्दी सा देश है 15,20साल पहले इसकी कोई अहमियत नहीं थी अचानक ही दुनिया के सामने वो धूमकेतु की तरह उभर ,दूजिया का मीडिया हाउस बना ,कैसे इसे जानिए

June 8, 2022 . by admin

संवाददाता राशिद मोहमद खान मिडिल ईस्ट में एक मामूली सा देश है-कतर पन्द्रह बीस साल पहले इसकी कोई अहमियत नहीं थी। इसके बाद अचानक से...

READ MORE

जापान ,भारत समेत 11देशों को मिसाइल और जेट जैसे घातक सैन्य उपकरणों के निर्यात की इजाजत देने की बना रहा है योजना

May 28, 2022 . by admin

डॉक्टर अरूण कुमार मिश्र जापान भारत समेत ग्यारह देशों को मिसाइल और जेट – घातक सैन्य उपकरणों के निर्यात की अनुमति देने की बना रहा...

READ MORE

TWEETS