ऐ मुहम्मद आजतक मेरे लिए आपके चेहरे से बढ़कर नपसंदीदा कोई चेहरा नही था और आज आप से ज्यादा महबूब चेहरा कोई नही है!

एडमिन

सुमामा बिन उसाल

आज से पहले आप के दीन से बढ़कर कोई खराब दीन नहीं था और आज आप के दीन से प्यारा कोई दीन नहीं है , आज से पहले मेरे लिए आप के इस शहर से मकरूह शहर कोई नहीं था और आज इस से पसंदीदा कोई शहर नहीं ।
यह लाइनें कहने वाले अरब के मशहूर क़बीला बनी हनीफा के सरदार सुमामा बिन उसाल थे ।
सुमामा बिन उसाल गोरा रंग , लंबी कद काठी , ऊंची आवाज़ के मालिक थे देख कर ही लगता था कि कोई सरदार है और थे भी एक मशहूर सरदार और गल्ले के बड़े व्यापारी ।
लेकिन पता नहीं क्यों इस्लाम की दुश्मनी दिल में पाले हुए थे ?इनके हाथों कई सहाबी शहीद हो चुके थे और इरादा नबी करीम सललाहो अलैहे वसल्लम को क़त्ल करने का था।
ग़ज़वा खंदक़ में जब अरब के तमाम कबीलों ने मिलकर मदीना पर हमला किया था यह खुद भी अपने कबीले के लड़ाकूओं को लेकर हमलावर हुए थे।
जंग के बाद अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने कुछ कबीलों की ओर अपनी सेना भेजी ताकि जो लोग मदीना पर हमले में शामिल थे उन्हें सबक़ सिखाया जा सके ।
इसी के अंतर्गत सेना की एक छोटी टुकड़ी को हज़रत मोहम्मद बिन मसलमा के नेतृत्व में नज्द के क्षेत्र की ओर भेजा जब यह टुकड़ी वापस आई तो कुछ लोगों को गिरफ्तार करके मदीना लाई इन्हीं में सुमामा बिन उसाल भी थे इस्लामी सेना के लोग उन्हें पहचानते नहीं थे उन्हें लाकर मस्जिदे नबवी के एक खंभे से बांध दिया गया।
जब नबी करीम सललाहो अलैहे वसल्लम मस्जिद में तशरीफ़ लाए सुमामा बिन उसाल को देखा देखते ही पहचान गए पूछा ए सुमामा तुम्हारे साथ क्या सलूक किया जाय सुमामा ने कहा कि यह आप पर है अगर मुझे कत्ल करते हैं।
तो ग़लत न होगा मैं ने कई लोगो का कत्ल किया है अगर मुझे छोड़ देते हैं तो मुझे शुक्रगुजार पाएंगे और अगर पैसे लेकर छोड़ना चाहें तो इस के लिए भी मैं तैयार हूं ।
नबी करीम सललाहो अलैहे वसल्लम ने कुछ जवाब नहीं दिया , अपने साथियों से कहा कि इनकी रस्सी को ढीली कर दो और मेरी ऊंटनी का दूध सुबह शाम पीने के लिए देते रहो फिर घर आएं और अपनी पत्नियों से कहा कि मस्जिद में सुमामा के लिए खाना भेज दो।
सुमामा को उम्मीद थी कि उसके पुराने कामों के बदले उस से अच्छा सुलूक नहीं होगा लेकिन उसे नहीं पता था कि वह रहमतुल लिलआलमीन की कैद में था जहां दुश्मन कैदियों के साथ भी बहुत अच्छा बर्ताव होता था।
दूसरे दिन फिर नबी करीम सललाहो अलैहे वसल्लम उसके पास गए और पहले दिन वाला सवाल दोहराया सुमामा ने फिर वही जवाब दिया आप आगे बढ़ गए कुछ न कहा।
तीसरे दिन फिर उस के पास गए और वही सवाल किया सुमामा ने फिर वही जवाब दिया हजूर ने अपने साथियों को आदेश दिया कि सुमामा को छोड़ दो ।
सुमामा तेजी से मस्जिद से निकल गए , वह कैद से वह मुक्त हो गए थे लेकिन इन तीन दिनों में वह एक दूसरे कैद में जा फसें थे वह क़ैद था मोहब्बत का , अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम के व्यवहार व अख्लाक ने उन्हें अपना असीर व बंदी बना लिया था।
मस्जिद से निकल कर पास के बाग़ में गए वहां कुआं था वहीं नहाया धोया और पाक व साफ हो कर दोबारा मस्जिद में आएं और आते ही कलमा पढ़ कर इस्लाम कबूल कर लिया।
अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम बहुत खुश हुए दुआएं दीं उन्होंने अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम से इजाज़त मांगी कि मैं मक्का जा कर उमरा करना चाहता हूं आप ने इजाजत दे दी।
हज़रत सुमामा का इरादा था कि उमरा करूं और मक्का में खुल कर अपने इस्लाम लाने का ऐलान करूं।
आप मक्का गएं और मुसलमानों वाला तलबीया पढ़ना शुरू किया। आवाज तेज़ थी सबने सुन लिया कुछ नौजवान मारने के लिए आगे बढ़े कुछ ने अपने धनुष में बाण चढ़ा लिए लेकिन वहां मौजूद बड़े बूढों ने उन्हें रोक लिया क्या करते हो? वह एक सरदार हैं उनके कबीले से दुश्मनी महंगी पड़ेगी।
हज़रत सुमामा बिन उसाल जब उमरा कर चुके तो उनके पास मक्का के लोग आएं और कहा कि सुमामा तुम अधर्मी हो गए हो उन्होंने जवाब दिया नहीं मैं मुसलमान हो गया हूं और सुन लो जो मोहम्मद का दुश्मन वह मेरा भी दुश्मन है।
आज से मैं मक्का पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता हूं मेरे कबीला से तुम्हें गेहूं का एक दाना भी न मिलेगा।
मक्का के सरदारों ने समझाने की कोशिश की लेकिन यह रुके नहीं अपने कबीले वापस चले गए और मक्का पर आर्थिक प्रतिबंध लागू कर दिया कछ ही दिनों में मक्का वालों की हालत खराब हो गई,
और उन्होंने अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम को खत लिखकर दरख्वास्त की कि सुमामा से कह कर आर्थिक प्रतिबंध हटवा दें अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत सुमामा बिन उसाल को कहला भेजा कि प्रतिबंध हटा लें और उन्होंने हटा लिया।
वह मौजूदा सऊदी अरब के मशहूर शहर अलखरज के पास के थे आज अलखरज व रियाद शहर में बहुत सी सड़कों , स्कूलों व मस्जिदों को उन का नाम दिया गया है
रज़िल्लाह अनहो ।

संवाद
अफजल शेख,

खुर्शीद अहमद साहब

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