आज से बीस साल पहलेअमेरिकी मुसलमान राजनीति में हिस्सा नही लेते थे ,लेकिन अब ये दौर नही रहा ,यहां के मुसलमान अब रखते है एक मजबूत सियासी पहचान! कैसे?जाने एक खुलासा

एडमिन

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अल जज़ीरा ने एक स्टोरी की है जिसमे बताया है कि आज से बीस साल पहले अमेरिकी मुसलमान राजनीति में हिस्सा नही लेते थे लेकिन आज मुसलमान वहां एक मज़बूत सियासी पहचान रखते हैं!
और अमेरिकी मुसलमानों के इस सियासी सफ़र का आगाज़ एक क्राइसिस से हुआ,
अमेरिकी मुसलमानों ने अपनी बहादुरी और हिम्मत से एक क्राइसिस को ऑपर्चुनिटी में बदल दिया।

शुरुआत कुछ ऐसे हुई कि 9/11 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद अमेरिकी मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक माहौल बनता चला गया। उन्हें देशद्रोही समझा जाने लगा, उनके ख़िलाफ़ नफ़रत और भेदभाव में विस्फोटक वृद्धि हो गयी।
एक तरफ़ सरकार उन्हें टारगेट कर रही थी दूसरी तरफ़ सामाजिक भेदभाव और नफ़रत में इज़ाफ़ा होता जा रहा था,

ऐसे मुश्किल हालात के दौर में अमेरिकी मुसलमानों ने अपनी आइडेंटिटी के साथ अमेरिका के मेनस्ट्रीम पोलिटिकल स्ट्रक्चर में स्थापित होने की शुरआत की, ये एक तरह से सेल्फ़ डिफेंस में उठाया गया क़दम था।

लेखक और ब्रुकलिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मुस्तफ़ा बायोमी कहते हैं कि अमेरिका में मुसलमान हमेशा से रहते आ रहे हैं। लेकिन अमेरिकी मुसलमानों ने राजनीतिक रूप से 9/11 के बाद स्थापित होने की शुरुआत की, जिसका मुख्य कारण 9/11 के बाद पैदा हुआ नफ़रत और भेदभाव था।

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा बायोमी कहते हैं कि अमेरिकी मुसलमानो ने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया कि इसके बाद कोई उन्हें बचाने नही आएगा बल्कि उन्हें ख़ुद ही अपने आप को बचाना होगा।
आगे प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं कि जब आप देखते हैं कि एक संगठित सामाजिक विरोध आपके ख़िलाफ़ हो रहा है तो उसके जवाब में आपको अपनी आइडेंटिटी बनाकर उसका मुक़ाबला करना होता है, इससे आप अपनी हिफाज़त भी करते हैं और अपने लिए समाज मे जगह भी बना पाते हैं।

हुआ ऐसा कि
पिछले बीस साल के राजनीतिक सक्रियता के फ़लस्वरूप अमेरिकी मुसलमान एक मेनस्ट्रीम राजनीतिक ताक़त के तौर पर सामने आए हैं।
जिसका नतीजा ये निकल रहा है कि हर आने वाले इलेक्शन में मुस्लिम उम्मीदवारों की तादाद बढ़ती ही जा रही है ।
सिटी कॉउन्सिल से लेकर स्टेट लेजिस्लेचर तक मुसलमानो की नुमाइंदगी बढ़ती जा रही है।

आज वहां के मुसलमानो के पास इल्हान उमर जैसी नेता है जो दुनिया के हर मुस्लिम के मसायल पर खुलकर आवाज़ उठाती हैं!
गंगा और यमुना की तरह अमेरिका में भी मिसिसिपी और मिसौरी नदियां बहती हैं। लेकिन वहां के मुस्लमानो ने किसी मिसिसिपी मिसौरी तहज़ीब को बचाने का नारा नही लगाया, बल्कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष का रास्ता चुना।
उन्होंने सियासत में हिस्सदारी बढ़ानी शुरू की और हालात का रुख़ मोड़ दिया।

हम हिंदुस्तानी मुसलमानो को उनसे सीखना चाहिए कि हमारी लड़ाईया भी कोई दूसरा लड़ने नहीं आएगा, हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी, अपना स्पेस खुद बनाना होगा।
हिंदुस्तानी मुसलमानो के साथ भी वही हालात हैं जो आज से बीस साल पहले अमेरिकी मुसलमानो के साथ थे,

आज यहां एक तरफ़ सरकार मुसलमानो को टारगेट कर रही है, तो दूसरी तरफ़ सामाजिक स्तर पर मुसलमानो के ख़िलाफ़ नफरत और भेदभाव चरम पर है।
ऐसे माहौल में मुसलमानों को अपनी सियासत और अपनी क़यादत को मजबूत करके उसी तरह हालात का रुख़ मोड़ देना चाहिए जैसे अमेरिकी मुसलमानो ने कर दिखाया है। गोया हिंदुस्तानी मुसलमान भी इस क्राइसिस को ऑपर्चुनिटी में बदल सकते हैं और यक़ीनन बदलेंगे इंशाअल्लाह।

संवाद:राशिद मोहमद

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